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व्रत का क्या अर्थ है, व्रत-उपवास क्यों और किस तरह करें की सफलता मिले

आज बहुत से लोग अतिरिक्त वजन से परेशान हैं। मोटापा की बीमारी के कारण शरीर में फेट, या वसा, बढ़ता है, जो अनियमित दिनचर्या और अनियमित खान-पान से होता है। हमारे स्वास्थ्य पर इसका बहुत बुरा असर होता है। व्रत-उपवास ऐसी कई बीमारियों से बचने में बहुत प्रभावी है।

आज बहुत से लोग अतिरिक्त वजन से परेशान हैं। मोटापा की बीमारी के कारण शरीर में फेट, या वसा, बढ़ता है, जो अनियमित दिनचर्या और अनियमित खान-पान से होता है। हमारे स्वास्थ्य पर इसका बहुत बुरा असर होता है। व्रत-उपवास से धर्म लाभ मिलता है और कई बीमारियों से बचने में भी काफी प्रभावी है।

भारतीय संस्कृति में हर दिन कोई व्रत या उपवास नहीं होता, क्योंकि व्रत का अर्थ है संकल्प या दृढ़ निश्चय, और उपवास का अर्थ है ईश्वर या इष्टदेव के समीप बैठना। हर धर्म ने व्रत उपवास की जरूरत बताई है। यही कारण है कि हर व्यक्ति अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार उपवास या व्रत करता है। वास्तव में, व्रत उपवास हमारे शारीरिक और मानसिक स्वच्छता से जुड़ा है। यह हमारे शरीर को स्वस्थ बनाए रखता है। कई प्रकार के व्रत हैं, उदाहरण के लिए नित्य, नैमित्तिक और काम्य व्रत।

भगवान को प्रसन्न करने के लिए निरंतर नित्य व्रत किया जाता है। नैमित्तिक व्रत किसी उद्देश्य से किए जाते हैं।

काम्य- किसी कामना से किया व्रत काम्य व्रत है।

नियमित भोजन के स्वास्थ्य लाभ: नियमित भोजन करने से शरीर स्वस्थ रहता है। पाचन तंत्र को आराम मिलता है जब आप निराहार रहते हैं, एक बार खाते हैं या केवल फलाहार खाते हैं। इससे कब्ज, गैस, एसिड अजीर्ण, अरूचि, सिरदर्द, बुखार और मोटापा दूर होते हैं। आध्यात्मिक बल बढ़ा है। ज्ञान, विचार और शुद्धता बुद्धि का विकास है। इसलिए उपवास व्रत पूजा में शामिल है।

किसे नहीं करना चाहिए व्रत: उपवास करने से सन्यासी, बालक, रोगी, गर्भवती स्त्री और वृद्ध व्यक्ति को छुटकारा मिलता है।

धर्म के नियम हैं: इन नियमों का पालन उस दिन करना चाहिए जब व्रत या उपवास होता है।

  • हिंसा करने से बचें।
  • दिन में सोने से बचें।
  • बार-बार पानी नहीं पीना चाहिए।
  • झूठ मत बोलो। किसी को बदनाम मत करो।
  • व्यसन करने से बचें।
  • भ्रष्टाचार करने से बचने का निश्चय करें।
  • व्यभिचार नहीं करना चाहिए।
  • किसी भी अधार्मिक कार्य को न करें, अन्यथा व्रत का पूरा पुण्य लाभ नहीं मिलेगा।

उपवास करने के लाभ: ऋषि-आचार्यों ने तपस्या, संयम और नियमों को व्रत के समान माना है। वास्तव में उपवास और व्रत दोनों एक हैं। संस्कृत में, “उप” का अर्थ समीप होता है और “वास” का अर्थ बैठना है, यानी परमात्मा का ध्यान लगाकर उनकी प्रशंसा करना। और भी एक अंतर है कि व्रत में भोजन किया जाता है, जबकि उपवास में निराहार रहना पड़ता है। हिंदू संस्कृति और धर्म में व्रत और उपवास महत्वपूर्ण हैं, वेद, धर्मशास्त्र, पुराण और वेदाङ्गों में व्रतों पर बहुत कुछ कहा गया है। व्रतों पर कई लेख और निबंध लिखे गए हैं, जिनमें व्रतराज, व्रतार्क, व्रतकौस्तुभ, जयसिंह कल्पद्रुम, मुक्तक संग्रह और हेमाद्रिव्रतखण्ड शामिल हैं।

तप करने के लाभ: हमारे तपस्वी ऋषियों ने मनुष्यों के कल्याण के लिए कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक दुःखों को दूर करने के लिए कई उपाय निर्धारित किए हैं। व्रत-उपवास भी उनमें से एक है। नियमित व्रत करने से हमारा शारीरिक बल, मनोबल और आत्मबल बढ़ता है, जो हमारे अच्छे स्वास्थ्य का कारण बनता है। हमारी आत्मविकास होता है। हमारे अंदर दया, करुणा, प्रेम, सहनशीलता, सहयोग की भावना बढ़ती है और काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, स्वार्थ जैसे कई विकार दूर होते हैं। जिससे हम देश, समाज, दुनिया और समस्त मानवता के कल्याण में अपने आप के साथ भी योगदान दे सकें।

व्रत कितने प्रकार के होते हैं?

कितने प्रकार हैं? व्रत शास्त्रों के अनुसार, यज्ञ, तप और दान ही एक व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण काम हैं। “तप”, व्रत और उपवास के नियमों का पालन करके शरीर को तपाना है। बहुत से व्रत हैं और उनके बहुत से प्रकार भी हैं। ये कायिक, वाचिक, मानसिक, नित्य, नैमित्तिक, काम्य, एकभुक्त, अयाचित, मितभुक, चांद्रायण और प्रजापत्य हैं ।

  1. कायिक व्रत: हिंसा का त्याग करना, नियमित और उचित भोजन करना, धन नहीं कमाने, ब्रह्मचर्य करना आदि
  2. वाचिक व्रत: सत्य बोलना, मधुर बोलना, निंदा करना और चुप रहना
  3. मानसिक नियंत्रण व्रत: वैराग्य, भक्ति, मानसिक जप, स्वाध्याय (वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, रामायण, ऋषि और विद्वानों द्वारा लिखित अन्य पॉजिटिव साहित्य), ईश्वर की शरणागति और दीन-दुखियों की सेवा
  4. पुण्यसंचय के एकादशी आदि ‘नित्य’ व्रत हैं, पापों को दूर करने के लिए चांद्रायण (चंद्र तिथियों के अनुसार) आदि ‘नैमित्तिक’ व्रत हैं, वटसावित्री आदि ‘काम्य’ व्रत हैं, और सुख-सौभाग्य आदि के व्रत हैं।
  5. ‘एकभुक्त’ व्रत के स्वतंत्र (दिनार्ध में), अन्याङ्ग (मध्याह्न में) और प्रतिनिधि
  6. रात्रि में किया जाता है ‘नक्तव्रत’, परन्तु विधवा को सूर्य के रहते हुए किया जाता है।
  7. ‘अयाचितव्रत’ में बिना मांगे जो कुछ मिलता है, उसका निषेधकाल बचाकर दिन या रात में केवल एक बार भोजन करें। “मितभुक्त” हर दिन लगभग 10 ग्राम खाता है। ये दोनों व्रत परम सिद्धि देंगे।
  8. ‘प्राजापत्य’ का अवधि बारह दिनों का होता है। हिंदू धर्म में पांच महाव्रत हैं। संवत्सर (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा), रामनवमी (चैत्र शुक्ल नवमी), कृष्णजन्माष्टमी (भाद्रपद अष्टमी), शिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी) और दशावतार (भाद्रपद शुक्ल दशमी) हैं। शास्त्रों के अनुसार मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, समय यानि काल और देवपूजा का बहुत महत्व है।

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