राजस्थान में बांसवाड़ा से लगभग 14 किलोमीटर दूर पर तलवाड़ा ग्राम से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर ऊंची रौल श्रृखलाओं के नीचे सघन हरियाली की गोद में उमराई के छोटे से गांव में माताबाढ़ी में प्रतिष्ठित है देवी त्रिपुरा को सुंदरी भी कहा जाता है, इस मंदिर के आस पास पहले से ही 3 दुर्ग बने हुए थे, शक्तिपुरी, शिवपुरी तथा विष्णुपुरी इन तीन पुरी में स्थित होने के कारण देवी का नाम त्रिपुरा सुंदरी पड़ गया.
किस प्रकार हुआ इस शक्तिपीठ का निर्माण
महादेव की पत्नी देवी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई, जब सब शिवजी को यह सब पता चला तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ स्थल को उजाड़ दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया, बाद में शिवजी अपनी पत्नी सती की जली हुई लाश लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे, जिस स्थान पर माता सती के अंग और आभूषण गिरे थे वह स्थान शक्तिपीठों में निर्मित हो गए, यदि पौराणिक कथाओं की मानें तो उनके अनुसार देवी देह के अंगों से इनकी उत्पत्ति हुई, जिसे भगवान विष्णु के चक्र से विच्छिन्न होकर 108 स्थलों पर गिरे थे, जिनमें से 51 शक्तिपीठों का ज्यादा महत्व माना गया है.
त्रिपुरा- त्रिपुर सुंदरी
भारत के त्रिपुरा राज्य उदरपुर के निकट राधाकिशोरपुर गांव के माताबाढ़ी पर्वत शिखर पर देवी सती का दाया पैर गिरा था, इसकी शक्ति त्रिपुरा सुंदरी और भैरव के त्रिपुरेश कहलाते हैं, दक्षिणी-त्रिपुरा उदयपुर शहर से तीन किलोमीटर दूर, राधा किशोर ग्राम में राजा राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी का भव्य मंदिर स्थित है, जो उदयपुर शहर के दक्षिण पश्चिम में पड़ता है यहां सती के दक्षिण ‘पाद’ का निपात हुआ था, यह शक्तिपीठ के स्थान को ‘कूर्भपीठ’ के नाम से भी जाना जाता है.
भारत राज्य के त्रिपुरा में स्थित त्रिपुरा सुंदरी का शक्तिपीठ है, कहा जाता है कि यहां देवी सती के धारण किए हुए वस्त्र गिरे हुए थे, त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ भारतवर्ष के अज्ञात 108 एवं ज्ञात इन चारों शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, देवी ललिता को त्रिपुर सुंदरी के नाम से भी जानते हैं, षोडशी माहेश्वरी शक्ति की विग्रह वाली शक्ति है, इनकी चारभुजा और तीन नेत्र दिखाए गए हैं, इनमें षोडश कलाएं पूर्ण है इसलिए षोडशी भी कहां गया है.
देवी ललिता आदिशक्ति का वर्णन देवी पुराण में भी दिया गया है, भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिष में लिंगधारिणीनाम से विख्यात हुईं इन्हें ललिता देवी के नाम से लोगों के बीच विख्यात हो गई, जब भगवान द्वारा छोड़े गए चक्र से पाताल लोक समाप्त होने लगा, इस स्थिति से विचलित होकर ऋषि-मुनि भी घबरा जाते हैं, और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगती है, तब सभी ऋषि माता ललिता देवी की उपासना करने लगे थे, रिसीवर की प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुई, तथा इस विनाशकारी चक्र को थाम लेती हैं.