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Prithviraj Chauhan – सम्राट पृथ्वीराज चौहान का इतिहास हिंदी में

आज हम आपको Prithviraj Chauhan – सम्राट पृथ्वीराज चौहान का इतिहास हिंदी में बताने जा रहे हैं. कृपया पूर्ण जानकारी के लिए इस ब्लॉग को अवश्य पढ़ें. और अन्य जानकारी के लिए नव जगत के साथ बने रहे.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान छत्रिय वंश के हिंदू राजा थे, सम्राट पृथ्वीराज चौहान का जन्म सन 1166 में अजमेर के चौहान वंश में हुआ था, इनके पिता का नाम राजा सोमेश्र्वर और माता का नाम कपूरी देवी था. इनका जन्म इनके माता-पिता की शादी के 12 वर्ष पश्चात हुआ था, और यही कारण था कि उस राज्य में हाहाकार मच गया था, अजमेर राज्य में सभी चाहते थे, कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु जन्म के समय ही हो जाए परंतु ऐसा ना हुआ, उनके खिलाफ कई षड्यंत्र भी रचे गए परंतु वह बचते गए. जब उनकी आयु 11 वर्ष की थी तब उनके माता पिता का निधन हो गया था. उसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने स्वयं का दायित्व अच्छी तरह से निभाते हुए लगातार अन्य राज्यों में विजय प्राप्त करते गए, और अपने राज्य का विस्तार करते गए. साथ ही सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने उत्तर भारत में 12वीं सदी के उत्तरार्ध में उन्होंने अजमेर और दिल्ली पर राज किया था.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान के मित्र (Prithviraj Chauhan Ke Sacche Mitra Kaun The)

हम आपको बता दें कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बचपन के मित्र चंदबरदाई थे. चंदबरदाई उनके लिए किसी सगे भाई से कम नहीं थे. चंदबरदाई तोमर वंश के शासक अनंगपाल की पुत्री के पुत्र थे . चंदबरदाई बाद मे दिल्ली के शासक हुये और उन्होने पृथ्वीराज चौहान के सहयोग से पिथोरगढ़ का निर्माण किया, जो आज भी दिल्ली मे पुराने किले नाम से विद्यमान है.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान की विशाल सेना (Samrat Prithviraj Chauhan Ki Vishal Sena)

हम आपको बता दें कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सेना इतनी विशालकाय थी, कि इन से युद्ध करने से पहले युद्ध करने वाले राज्य भयभीत तो हो जाया करते थे, सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सेना में 3 लाख सैनिक और 300 हाथी थे. ऐसा माना जाता है, कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अपनी सेना को बहुत अच्छी तरह से संगठित किया था, और यही कारण था कि वह अपनी इसी सेना के कारण कई राज्यों से युद्ध में विजय प्राप्त करके अपने राज्य का विस्तार करते गए. परंतु जीवन में पहली बार पृथ्वीराज चौहान युद्ध हारे, क्योंकि उनके अपनों ने उनके साथ गद्दारी की और उनके पास कुशल घुड़ सवारों की भी कमी थी, साथ ही उनका सहयोग अन्य राजपूत राजाओ ने नहीं किया. और यही कारण रहा कि मोहम्मद गौरी सम्राट पृथ्वीराज चौहान से द्वितीय युद्ध जीत गया.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी का प्रथम विश्व युद्ध (Samrat Prithviraj Chauhan Aur Muhammad Gauri Ke Sath Pratham Yudh Kab Huaa)

हम आपको बता दें कि अपने राज्य के विस्तार के लिए सम्राट पृथ्वीराज चौहान प्रतिक्षण सजग रहते थे. और इस बार अपने विस्तार के लिए उन्होंने पंजाब राज्य पर युद्ध करने का सोचा. परंतु उस समय पूरे पंजाब पर मुहम्मद शाबुद्दीन गौरी का शासन था, और गौरी से युद्ध किए बिना पंजाब पर शासन करना बहुत ही मुश्किल था, तो इसी उद्देश्य से पृथ्वीराज ने अपनी विशाल सेना को लेकर गौरी पर आक्रमण कर दिया. अपने इस युध्द मे पृथ्वीराज ने सर्वप्रथम हांसी, सरस्वती और सरहिंद पर अपना अधिकार किया. परंतु इसी बीच अनहिलवाड़ा मे विद्रोह हुआ और पृथ्वीराज को वहां जाना पड़ा और यही कारण था कि पृथ्वीराज चौहान ने अपनी सेना से अपना नियंत्रण खो दिया, और सरहिंद का किला एक बार फिर से खो दिया. अब जब पृथ्वीराज अनहिलवाड़ा से वापस लौटे तो उन्होंने दुश्मनों पर आक्रमण कर दिया और युध्द मे केवल वही सैनिक बचे, जो मैदान से भाग खड़े हुये, इस युद्ध में मोहम्मद गोरी भी बुरी तरह से जख्मी हो गया, परंतु उनके एक सैनिक ने उनकी हालत का अंदाजा लगते हुये, उन्हे घोड़े पर डालकर अपने महल ले गया और उनका उपचार कराया. और यही कारण रहा कि प्रथम युद्ध परिणाम हीन रहा इसका कोई परिणाम नहीं निकला ना मोहम्मद गौरी जीता और ना ही पृथ्वीराज चौहान हारे.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी का दूसरा विश्वयुद्ध (Samrat Prithviraj Chauhan Aur Muhammad Gauri Ke Sath Dusra Yudh)

अपनी पुत्री संयोगिता के अपहरण के बाद राजा जयचंद्र ने पृथ्वीराज चौहान के प्रति विरोध कर दिया. और वो पृथ्वीराज के खिलाफ अन्य राजपूत राजाओ को भी भड़काने में लग गया. जब उसे मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज के युध्द के बारे मे पता चला, तो वह पृथ्वीराज चौहान से बदला लेने के लिए मोहम्मद गौरी के साथ मिल गया, दोनों ने मिलकर 2 साल बाद सन 1192 मे पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया. यहां युद्ध भी वही किया गया जहां प्रथम युद्ध हुआ था तराई के मैदान में. इस युध्द के समय जब पृथ्वीराज के मित्र चंदबरदाई ने अन्य राजपूत राजाओ से मदत मांगी, तो संयोगिता के स्व्यंबर मे हुई घटना के कारण सभी राजपूत राजाओं ने मदद करने से मना कर दिया. ऐसे मे पृथ्वीराज चौहान युद्ध करने में अकेले पड़ गए और उन्होने अपने 3 लाख सैनिको के द्वारा गौरी की सेना का सामना करने का फैसला किया. परंतु गौरी की सेना में अच्छे घुड़सवार मौजूद थे और यही कारण था कि उन्होने पृथ्वीराज की सेना को चारो ओर से घेर लिया. ऐसे मे वे न आगे पढ़ पाये न ही पीछे जा पाए. और जयचंद्र के गद्दार सैनिको ने राजपूत सैनिको का ही संहार किया जिससे पृथ्वीराज चौहान को हार का सामना करना पड़ गया. युद्ध में पराजय प्राप्त करने के पश्चात पृथ्वीराज चौहान और उनके मित्र चंद्रवरदाई को बंदी बना लिया गया.

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु (Samrat Prithviraj Chauhan Ki Mrityu Kaise Hui)

मोहम्मद गौरी ने युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात पृथ्वीराज को बंदी बनाकर अपने साथ अपने राज्य अफगानिस्तान ले गया. वहा उन्हे कई प्रकार की यातनाएं दी गई, तथा पृथ्वीराज की आखो को लोहे के गर्म सरियो द्वारा जलाया गया, इसके कारण पृथ्वीराज चौहान ने अपनी दोनों आंखें खोल दी. परंतु तब भी पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी के सामने अपना सिर नहीं झुकाया, पृथ्वीराज चौहान को मारने से पहले मोहम्मद गौरी ने उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी, तो पृथ्वीराज चौहान ने भरी सभा मे अपने मित्र चंदबरदाई के शब्दो पर शब्द भेदी बाण का उपयोग करने की इच्छा को बताया. और इसी प्रकार चंदबरदई द्वारा बोले गए दोहे का प्रयोग करते हुये, पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी बाण मोहम्मद गौरी के सीने में मारी. और अपने शरीर की दुर्गति से बचने के लिए चंदबरदाई और पृथ्वीराज चौहान ने एक दूसरे को मार लिया.

आशा करते हैं कि यह ब्लॉग आपको Prithviraj Chauhan – सम्राट पृथ्वीराज चौहान का इतिहास की पूर्ण जानकारी प्रदान करने में समर्थ रहा. अन्य महत्वपूर्ण और रोचक जानकारी के लिए हमारे अन्य ब्लॉग को अवश्य पढ़ें.

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