मानस शक्तिपीठ हिंदू धर्म में प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक माना गया है, हिंदू धर्म के पुराणों के अनुसार जिस जगह देवी सती के अंग के टुकड़े धारण किए हुए वस्त्र और आभूषण गिरे, उन सभी स्थानों पर शक्तिपीठ का निर्माण हुआ, इन शक्तिपीठों का हिंदू धर्म में बहुत बड़ा महत्व माना जाता है, इन जगहों को अत्यंत पावन तीर्थ स्थान मानते हैं, ये तीर्थ पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में फैले हुए हैं, देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन किया गया है, और मानस शक्तिपीठ उनमें से एक है.
हिंदुओं के लिए कैलाश पर्वत भगवान शिव का सिहासन माना जाता है, बौद्धों के लिए विशाल प्राकृतिक मण्डप और जैनियों के लिए ऋषभदेव का निर्वाण स्थल कहलाता है हिंदू तथा बौद्ध दोनों ही इस स्थान को तांत्रिक शक्तियों का भंडार मानते हैं, अभी के समय में भौगोलिक दृष्टि से यह चीन के अधीन आता है, यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और तिब्बतियों के लिए अति-पुरातन तीर्थस्थान मानते हैं.
किस प्रकार हुआ इस शक्तिपीठ का निर्माण
महादेव की पत्नी देवी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई, जब सब शिवजी को यह सब पता चला तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ स्थल को उजाड़ दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया, बाद में शिवजी अपनी पत्नी सती की जली हुई लाश लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे, जिस स्थान पर माता सती के अंग और आभूषण गिरे थे वह स्थान शक्तिपीठों में निर्मित हो गए, यदि पौराणिक कथाओं की मानें तो उनके अनुसार देवी देह के अंगों से इनकी उत्पत्ति हुई, जिसे भगवान विष्णु के चक्र से विच्छिन्न होकर 108 स्थलों पर गिरे थे, जिनमें से 51 शक्तिपीठों का ज्यादा महत्व माना गया है.
मानस- दाक्षायणी
तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर के मानसा के निकट एक पाषाण शिला पर माता की बायीं हथेली का निपात गिरा हुआ था, इसकी शक्ति है दाक्षायनी और भैरव अमर हैं, मान्यता है कि यहां पर देवी सती का दाया हाथ गिरा था, कैलास शक्तिपीठ मानसरोवर का गौरवपूर्ण वर्णन हिन्दू, बौद्ध, जैन धर्म ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है, यहां स्वयं शिव हंस रूप में विहार करते हैं, तिब्बती धर्मग्रंथ ‘कंगरी करछक’ में मानसरोवर की देवी ‘दोर्जे फांग्मो’ का यह निवास स्थान बताया गया है, यहां भगवान देमचोर्ग, देवी फांग्मो के साथ नित्य विवाह करते हैं, इस ग्रंथ में मानसरोवर को ‘त्सोमफम’ कहते हैं, यह माना जाता है कि भारत से एक बड़ी मछली आकर उस सरोवर में ‘मफम’ करते हुए प्रविष्ट हुई, इसी कारण से इनका नाम ‘त्सोमफम’ रखा गया है.