यहां पर देवी सती के केशपाश का निपात हुवा था, यह शक्तिपीठ बहुत प्राचीन माना गया है, इस स्थान पर बज्र बालाओं ने श्री कृष्ण को पाने हेतु शक्ति पीठ में देवी कात्यायनी की पूजा अर्चना की थी. कालरूप पीठ के तत्कालीन स्वामी के शिष्यों ने इस भूतेश्वर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था, यहां की शक्ति उमा या कात्यायनी हैं, तथा भूतेश अथवा भूतेश्वर यहां के भैरव हैं, यहां पर भूतेश्वर महादेव का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, वृंदावन हेतु जाने वाले मार्ग पर इस मंदिर के अतिरिक्त कई आश्रम व मंदिर स्थापित है.
यह मंदिर मथुरा से वृंदावन जाते हुए लगभग 2 किलोमीटर पहले ही स्थित है, भूतेश्वर महादेव मंदिर जाने वाले यात्री यहां उतर सकते हैं, वृंदावन से आप छोटे वाहनों से भी जा सकते हैं.
कैसे हुआ शक्तिपीठ का निर्माण
भगवान शिव की पत्नी देवी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पिता से अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई, जब यह सब भगवान शिव को पता चला तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ स्थल को उजाड़ दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया, इसके बाद में भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे तो ब्रह्मांड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया था, जिस स्थान पर माता सती के अंग और आभूषण गिरे थे वह स्थान शक्तिपीठों में निर्मित हो गए, यदि पौराणिक कथाओं की मानें तो देवी देह के अंगों से शक्तिपीठ की उत्पत्ति हुई, जिसे भगवान विष्णु के चक्र से विच्छिन्न होकर 108 स्थलों पर गिरे थे, जिसमें से 51 शक्तिपीठों को ज्यादा महत्व दिया जाता है.
किरीट- विमला भुवनेशी शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल में स्थित मुर्शीदाबाद जिला के लालबाग कोर्ट रोड स्टेशन के किरीटकोण गांव के पास देवी सती का मुकुट गिरा था, इसकी शक्ति माने गए हैं विमला और शिव को संवर्त्त कहते हैं, अर्थात यहां की सती विमला अथवा भुवनेश्वरी हैं, तथा शिव हैं संवर्त, कुछ विद्वान् मुकुट का निपात कानपुर के मुक्तेश्वर मंदिर को भी मानते हैं.
पश्चिम बंगाल के हावड़ा स्टेशन से 2.5 किलोमीटर आगे लालबाग कोट स्टेशन है, जो हावड़ा-वरहर लाइन पर है, जहां से 5 किलोमीटर दूर है बड़नगर, वहीं हुगली नदी के तट पर स्थित है किरीट शक्तिपीठ, राजस्थान कोलकाता महानगर की सीमा में आता है.