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Alankar Kise Kahate Hain – अलंकार कितने प्रकार के होते है?

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आज हम आपको Alankar Kise Kahate Hain – अलंकार किसे कहते हैं? के बारे में बताने जा रहे हैं. कृपया पूर्ण जानकारी के लिए इस ब्लॉग को अवश्य पढ़ें. और अन्य जानकारी के लिए नव जगत के साथ बने रहे.

काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहते हैं.

वह शब्द जो काव्य की सुंदरता बढ़ाते हैं, उसे अलंकार कहते हैं.

उदाहरण के लिए जिस प्रकार से नारी अपनी सुंदरता बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के आभूषणों  को धारण करती हैं, उसी तरह काव्यों की सुंदरता बढ़ाने के लिए अलंकारों का उपयोग किया जाता है.

अलंकार कितने प्रकार के होते है? (Alankar Kitne prakar ke hote hai)

1.शब्दालंकार

2.अर्थालंकार

3.उभया अलंकार

1.शब्दालंकार (shabdalankar)

जब काव्य में शब्दों के माध्यम से काव्य के सौंदर्य में वृद्धि की जाती है, तो वह शब्दालंकार कहलाता है. 

उदाहरण –  कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय.

शब्दालंकार मुख्य रूप से तीन भेद होते हैं

  1. अनुप्रास अलंकार
  2. यमक अलंकार
  3. श्लेष अलंकार

1. अनुप्रास अलंकार – काव्य में जहां एक ही शब्द की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है तब वह काव्य अनुप्रास अलंकार कहलाता है.

उदाहरण –  तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए.

यहां “त” शब्द की आवृत्ति एक से अधिक बार हुई है, इसी कारण यह अनुप्रास अलंकार है.

2. यमक अलंकार – काव्य में जहां एक ही शब्द की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है और शब्दों के अर्थ अलग-अलग होते हैं उसे यमक अलंकार कहा जाता है.

उदाहरण – तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती है.

यहां एक शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है, एक का अर्थ समय से है, और दूसरे का अर्थ फल से है, इसलिए यहां यमक अलंकार है.

3. श्लेष अलंकार – श्लेष का अर्थ चिपके हुए से होता है, यथार्थ जब काव्य में कोई शब्द एक बार आए और उसके एक से अधिक अर्थ उत्पन्न हो, तो उसे श्लेष अलंकार कहते हैं.

उदाहरण – 

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून,

पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष चून.

2.अर्थालंकार (artha alankar)

काव्य में जहां अर्थ के माध्यम से काव्य के सौंदर्य में वृद्धि की जाती है. वह अर्थालंकार कहलाता है.

अर्थालंकार के प्रकार (arthalankar ke prakar)

अर्थाअलंकार के  मुख्य रूप से 23 प्रकार के होते हैं जिनके नाम नीचे निम्न रूप में दिए गए है:-

  1. उपमा अलंकार
  2. रूपक अलंकार
  3. उत्प्रेक्षा अलंकार
  4. द्रष्टान्त अलंकार
  5. संदेह अलंकार
  6. अतिश्योक्ति अलंकार
  7. उपमेयोपमा अलंकार
  8. प्रतीप अलंकार
  9. अनन्वय अलंकार
  10. भ्रांतिमान अलंकार
  11. दीपक अलंकार
  12. अपहृति अलंकार
  13. व्यतिरेक अलंकार
  14. विभावना अलंकार
  15. विशेषोक्ति अलंकार
  16. अर्थान्तरन्यास अलंकार
  17. उल्लेख अलंकार
  18. विरोधाभाष अलंकार
  19. असंगति अलंकार
  20. मानवीकरण अलंकार
  21. अन्योक्ति अलंकार
  22. काव्यलिंग अलंकार
  23. स्वभावोती अलंकार

1. उपमा अलंकार (upma alankar)

जब किसी व्यक्ति या वस्तु की तुलना किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु से की जाती है तो उसे उपमा अलंकार कहा जाता है.

उदाहरण –

सागर-सा गंभीर ह्रदय हो,

गिरी-सा ऊँचा हो जिसका मन।

2. रूपक अलंकार (rupak alankar)

जिस काव्य में उपमेय और उपमान के बीच के अंतर को समाप्त करके उसे एक कर दिया जाता है,उसे रूपक अलंकार कहते हैं.

उदाहरण –

उदित उदय गिरी मंच पर, रघुवर बाल पतंग,

विगसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन भ्रंग.

3. उत्प्रेक्षा अलंकार (utpreksha alankar)

जिस अलंकार में उपमान के न होने पर उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता हैं, उसे उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं.

उदाहरण – 

सखि सोहत गोपाल के, उर गुंजन की माल

बाहर सोहत मनु पिये, दावानल की ज्वाल.

4. द्रष्टान्त अलंकार (drishtant alankar)

जिस अलंकार के दो सामान्य या दो विशेष वाक्यों में बिम्ब-प्रतिबिम्ब का भाव होता है उसे दृष्टान्त अलंकार कहते हैं

उदाहरण –

एक म्यान में दो तलवारें, कभी नहीं रह सकती हैं.

5. संदेह अलंकार (sandeh alankar)

जब उपमेय और उपमान में समानता देखकर यह निर्धारित नहीं हो पाता है कि उपमान वास्तव में उपमेय है तो वहां संदेह अलंकार होता है.

उदाहरण – 

यह काया है या शेष उसी की छाया,

क्षण भर उनकी कुछ नहीं समझ में आया.

6. अतिशयोक्ति अलंकार (atishyokti alankar)

जब किसी व्यक्ति या वस्तु का वर्णन अत्यधिक बढ़ा चढ़ाकर कर दिया जाता है जो लोग समाज की सीमा मर्यादा का उल्लंघन कर देता है तो वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है.

उदाहरण –

हनुमान की पूंछ में लगन न पायी आगि,

सगरी लंका जल गई, गये निसाचर भागि.

7. उपमेयोपमा अलंकार (upma alankar)

जिस अलंकार में अपने को उपमान और उपमान को उसमें बनाने का प्रयास किया जाता है, उसे उपमेयोपमा अलंकार कहा जाता है.

उदाहरण –  तौ मुख सोहत है ससि सो अरु सोहत है ससि तो मुख जैसो.

8. प्रतीप अलंकार (pratip alankar)

जिस अलंकार में  उपमेय को उपमान के समान न कहकर उलट कर उपमान को ही उपमेय कहा जाता है, उस अलंकार को प्रतीप अलंकार कहा जाता है.

उदाहरण –  

बिदा किये बहु विनय करि, फिरे पाइ मनकाम,

उतरि नहाये जमुन-जल, जो शरीर सम स्याम.

9. अनन्वय अलंकार (anvay alankar)

जब किसी व्यक्ति को उपमेय की समानता के लिए कोई दूसरा उपमान नहीं मिलता, तब वह उपमेय की समानता के लिए उपमेय को ही उपमान बना देता है, तो वह अनन्वय अलंकार कहलाता है.

उदाहरण –

यद्यपि अति आरत-मारत है, भारत के सम भारत है.

10. भ्रांतिमान अलंकार (bhrantiman alankar)

जहाँ एक वस्तु को देखने पर दूसरी वस्तु को देखने का भ्रम उत्पन्न हो जाता हैं वह भ्रांतिमान अलंकार कहलाता है.

उदाहरण  – 

पायें महावर देन को नाईन बैठी आय,

फिरि-फिरि जानि महावरी, एडी भीड़त जाये.

11. दीपक अलंकार (dipak alankar)

वह अलंकार जो निकट के पदार्थों एवं दूर के पदार्थों का एकधर्म-संबंध वर्णित करता है  उसे दीपक अलंकार कहा जाता है.

उदाहरण – 

चंचल निशि उदवस रहें, करत प्रात वसिराज,

अरविंदन में इंदिरा, सुन्दरि नैनन लाज.

12. अपहूँति अलंकार (apanhuti alankar) 

जिस अलंकार में किसी सही बात या वस्तु को छिपाकर उसके स्थान पर किसी झूठी वस्तु को बतलाया जाता है वहाँ अपहूँति अलंकार होता है.

उदाहरण – 

नहिं पलास के पुहुप ये, हैं ये जरत अँगार.

13. व्यतिरेक अलंकार (vyatirek alankar)

जिस अलंकार में उपमान की अपेक्षा अधिक गुण होने के कारण उपमेय का उत्कर्ष होता है, उसे व्यतिरेक अलंकार कहते हैं.

उदाहरण – 

का सरवरि तेहिं देउं मयंकू,

चांद कलंकी वह निकलंकू.

14. विभावना अलंकार (vibhavana alankar)

जिस अलंकार में कारण के न होने पर भी कार्य होता है, उसे विभावना अलंकार  कहते हैं.

उदाहरण – 

बिनु पद चलै सुनै बिनु काना,

कर बिनु कर्म करै बिधि नाना.

15. विशेषोक्ति अलंकार (visheshokti alankar)

जब कारण ना होने पर भी कार्य करना पड़ता है, और किसी कारण के रहते हुए भी कार्य ना करना पड़ता हो, तो वह विशेषोक्ति अलंकार कहलाता है.

उदाहरण – 

सोवत जागत सपन बस, रस रिस चैन कुचैन,

सुरति श्याम घन की सुरति, बिसराये बिसरै न.

16. अर्थान्तरन्यास अलंकार (arthantarnyas alankar)

जब किसी सामान्य कथन से किसी विशेष कथन का या किसी विशेष कथन से किसी सामान्य कथन का समर्थन किया जाता हैं तो वह अर्थान्तरन्यास अलंकार कहलाता है.

उदाहरण –

बड़े न हूजे गुनन बिनु, बिरद बड़ाई पाय,

कहत धतूरे सों कनक, गहनो गढ़ो न जाय.

17. उल्लेख अलंकार (ullekh alankar)

जिस अलंकार में किसी एक वस्तु को अनेक प्रकार से बताया जाता हैं उस अलंकार को उल्लेख अलंकार कहा जाता है.

उदाहरण – 

तू रूप है किरण में, सौन्दर्य है सुमन में, 

तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में.

18. विरोधाभाष अलंकार (virodhabhas alankar)

जब किसी वस्तु या व्यक्ति का वर्णन करते समय विरोध के न होते हुए भी विरोध के होने का आभास होता है अलंकार को विरोधाभास अलंकार कहां जाता है.

उदाहरण –

आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हिमजल के,

शून्य हूँ जिसमें बिछे हैं पांवड़े पलकें.

19. असंगति अलंकार (asangati alankar)

जिस अलंकार में कारण कहीं और, कार्य कहीं और, होने का वर्णन किया जाता है, उस अलंकार को असंगति अलंकार कहा जाता है.

उदाहरण – 

तुमने पैरों में लगाई मेंहदी, 

मेरी आँखों में समाई मेंहदी.

20. मानवीकरण अलंकार (manvikaran alankar)

जिस अलंकार में काव्य के जड़ में चेतन का आरोप होता है, उस अलंकार को मानवीकरण अलंकार कहां जाता है.

उदाहरण – 

बीती विभावरी जागरी,

अम्बर पनघट में डुबो रही तास घट उषा.

21. अन्योक्ति अलंकार (anyokti alankar)

जिस अलंकार में किसी उक्ति के माध्यम से किसी दूसरे को कोई बात कही जाती हैं, उस अलंकार को अन्योक्ति अलंकार कहां जाता है.

उदाहरण – 

फूलों के आस- पास रहते हैं,

फिर भी काँटे उदास रहते हैं.

22. काव्यलिंग अलंकार (kavyaling alankar)

जिस अलंकार में किसी युक्ति के द्वारा समर्थित की गयी बात की जाती है, उस अलंकार को काव्यलिंग अलंकार कहते हैं.

उदाहरण – 

कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय,

उहि खाए बौरात नर, इहि पाए बौराय.

23. स्वभावोती अलंकार (svabhavokti alankar)

जिस अलंकार में किसी वस्तु का स्वाभाविक वर्णन किया जाता है उसे स्वभावोक्ति अलंकार कहते हैं.

उदाहरण-

सीस मुकुट कटी काछनी, कर मुरली उर माल,

इहि बानिक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल.

उभयालंकार (ubhaya alankar)

ऐसा अलंकार जो शब्दालंकार और अर्थालंकार के योग से बनता है, उसे उभयालंकार कहते हैं.

उभया अलंकार के चार अंग होते हैं

  1. उपमेय
  2. उपमान
  3. वाचक शब्द
  4. साधारण धर्म

1.  उपमेय – जिस व्यक्ति या वस्तु की समानता किसी दूसरी वस्तु से की जाती है वहां उपमेय होता है.

2. उपमान – उपमेय की जिस व्यक्ति या वस्तु के साथ समानता की जाती है उसे उपमान कहते हैं.

3. वाचक शब्द – उपमेय और उपमान में समानता दिखाने वाले शब्द को वाचक शब्द कहा जाता है.

4. साधारण धर्म – दो वस्तुओं के बीच समानता दिखाने के लिए जिस गुण या धर्म का प्रयोग किया जाता है उसे साधारण धर्म कहा जाता हैं.

आशा करते हैं कि यह ब्लॉग आपको मृदा की उर्वरा शक्ति की पूर्ण जानकारी प्रदान करने में समर्थ रहा. अन्य महत्वपूर्ण और रोचक जानकारी के लिए हमारे अन्य ब्लॉग को अवश्य पढ़ें.

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